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सामाजिक पहल

जय चित्रांश  हम सभी अपने स्वयं  के विकास के लिए कुछ नया करते रहते हैं, हम जानते हैं की जब स्वयं का विकास होगा तो उससे हमारे परिवार का विकास और परिवार के विकास से समाज का विकास होगा,  समाज का विकास करना हमारा कर्त्तव्य हैं , सबके मन में यह विचार होता ही हैं , किन्तु आर्थिक स्तिथि या अन्य बहुत प्रकार के कार्यो में सलग्न होने के कारण हम अपने समाज पर ध्यान नहीं दे पाते और एक जुट नहीं हो पाते। यहाँ एक जुट से मतलब यह बिलकुल नहीं की हमें कोई नेतागिरी करना हैं, सभी को एक स्थान पर एकत्रित होना हैं, हमें बार बार हो रही समाज की मीटिंग में शामिल होना हैं, या हमें चंदा देना हैं ,   मेरे विचार इस सब धारणाओं से बिलकुल अलग हैं , मेरा मानना हैं की हम समाज का सहयोग घर बैठे कर सकते हैं और उसमे अलग से आपकी कोई धनराशि व्यय नहीं होगी और ना ही समय देना होगा, बस आपको अपने मन में निश्चय करना होगा की में कोई भी वस्तु खरीदू या कोई भी सर्विस की आवश्यकता हो तो सबसे पहले अपने समाज से व्यापार करू. यदि   समाज   में नहीं मिले तो बाजार में कही से भी ले लू। ...

कायस्थ हब

कायस्थ हब एक कदम सामाजिक विकास की ओर  एप्प डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करे एप्प की कार्यप्रणाली की समझने के लिए वीडियो देखे

युग, प्रलय और दिव्य वर्ष

हम हमेशा से ही सुनते आ रहे हैं की यह कलयुग चल रहा हैं, और सतयुग में, द्वापर में बहुत अच्छा होता था आदि आदि , आइये आज जानते हैं चारो युगो के बारे में  युग चार प्रकार के होते हैं जो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग।   1. सतयुग  सनातन की पूर्ण स्तिथि होती हैं।  चारो दिशा में धर्म ही धर्म होता हैं. पिता के सामने पुत्र नहीं मरते। निंदा नहीं होती। भगवान श्री नारायण शुक्ल वर्ण के होते हैं. एक ही वेद की मान्यता होती हैं. जब आत्मतत्व की प्राप्ति कराने वाला धर्म हो तब सतयुग ही समझना चाहिए।  2. त्रेतायुग यज्ञ की प्रवत्ति होती हैं।  धर्म का एक पैर नष्ट हो जाता हैं, यदि अब तीन पाद ही होते हैं।  भगवान श्री नारायण रक्त वर्ण के होते हैं.  लोग अपने धर्म से नहीं डिगते। 3 . द्वापरयुग  वेद के चार भाग हो जाते हैं. धर्म के केवल दो पाद ही रहते हैं. भगवान श्री नारायण पित वर्ण के होते हैं.  अधर्म के कारण प्रजा क्षीण होने लगती हैं.  4. कलयुग भगवान श्री नारायण श्याम वर्ण के होते हैं.  धर्म क...

33 कोटि मुख्य देवता

33 कोटि मुख्य देवता  हम सभी सुनते आ रहे हैं की हमारे हिन्दू धर्म में ३३ करोड़ देवता हैं , लेकिन हमारे मुख्य देवता ३३ कोटि हैं , कोटि का अर्थ यहाँ प्रकार से हैं , यह सभी वेदोवत देवता भी कहलाते हैं, यह एक हजार युग के अनन्तर पुनः पुनः अपनी इच्छा अनुसार जन्म लेते रहते हैं।  12 आदित्य [अदिति के पुत्र (अदिति दक्ष प्रजापति की पुत्री हैं )]           धाता            मित्र            अर्थमा            शक्र            वरुण            अंश            भग            विवस्वान            पूषा            सविता            त्वष्टा            विष्णु  11  रूद्र (स्थाणु के पुत्र ) [...

पैसो के बारे में ऐसा क्या हैं जो अमिर माता-पिता अपने बच्चो को सिखाते हैं

पैसो के  बारे में ऐसा क्या हैं जो अमिर  माता-पिता अपने बच्चो को   सिखाते हैं और मध्यम वर्ग के माता-पिता नहीं सिखाते ! यह ब्लॉग उन सभी  माता-पिता के लिए हैं जो अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा देना चाहते हो, और उन वयस्कों के लिए जो जॉब कर रहे हो ! मेरा आप से निवेदन हैं की समय निकल कर इस लेख को जरूर पढ़े, ! आपका  संदीप निगम  "घर पर रहे, सुरक्षित रहे, सीखते रहे " www.selfimagination.in यह प्रश्न आप खुद से करे ! 1. "क्या स्कूल और कालेजों में जो शिक्षा  दी जा रही हैं वह पर्याप्त हैं, अपने बच्चो को अमीर बनाने के लिए ?" 2. क्यों गरीब और गरीब और अमीर और अमीर होते जा रहे हैं?, आखिर ऐसा क्या हैं जो दोनों के बिच की गैप बढ़ती ही जा रही हैं! अब समय आ गया हैं  1.  हमारी लाइफ के कुछ फ़ॉर्मूले चेंज करने का ! 2.  हमारे एजुकेशन सिस्टम को बदलने का ! 3.  चूहा दौड़ से बाहर निकलने का ! 4.  बच्चो को कम उम्र में ही सेविंग और इन्वेस्टमेंट से सम्बंधित ज्ञान देने का...

हमारी स्वीकृति और अस्वीकृति

सुख और दुख में, कोई ज्यादा भेद नहीं......! जिसे मन स्वीकारे , वह सुख और जिसे.......! अस्वीकारे वह दुख .......!! सारा खेल हमारी, स्वीकृति और अस्वीकृति ......! का ही तो है..........!!!

सम्मान दो...सम्मान लो.

रूठो बेशक अपनो से..... लेकिन मनाने से मान जाओ.... अपने तो आखिर अपने है... यह बात तुम मान जाओ.. होती है.. गलती... गलती से गलती न कि हो जिसने कभी.. सामने वह इंसान लाओ.. अक्सर टूटने पर पता चलती है अहमियत.. अनमोल दिल के रिश्ते को पहचान जाओ.. बजती है ताली दोनों हाथों से.. यह उसूल है दुनिया का... सम्मान दो...सम्मान लो..